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Akbar Birbal Top 10 Short Stories in Hindi | अकबर-बीरबल की प्रसिद्ध कहानियाँ

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Akbar Birabl Top 10 Short Storie in Hindi

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(1)बीरबल का रंग-रूप 

एक बार अकबर बादशाह ने अपने प्रिय दरबारी बीरबल से पूछा- तुम इतने काले रंग के कैसे हो गए? बादशाह की बात में कुछ चिढ़ाने वाला पुट भरा था। 

बीरबल ने कहा- जहांपनाह, जब अल्ला ताला के यहां खैरात बांटी जा रही थी तो उन्होंने सब खैरात प्राणियों के सामने रख दी। सब लोगों ने अपनी इच्छा एवं आवश्यकता के अनुसार उनमें से वस्तुएं चुन ली। > जहांपनाह मैं बुद्धि एवं विद्या ही लेता रह गया। रूप रंग की तरफ ध्यान ही नहीं गया। इसके विपरीत आप मात्र रूप रंग ही लेते रह गए। आपका ध्यान बुद्धि एवं विद्या की तरफ गया ही नहीं। इस प्रकार बीरबल ने यह सिद्ध किया कि वह बुद्धिमान है, किंतु बदसूरत हैं। इसके विपरीत बादशाह खूबसूरत किंतु बेवकूफ हैं 


(2) मूर्खों से मिली बुद्धि. 


एक दिन बादशाह ने पूछा- 'तुम्हें तीक्ष्ण बुद्धि कहां से मिली?' 
बीरबल- 'जहांपनाह, यह मुझे मूर्खों से मिली है!' 
प्रश्न जितना सरल, उत्तर उतना ही ज्यादा उलझन और चक्कर में डालने वाला, हैरान करने वाला! मूर्ख के पास तो बुद्धि होती ही नहीं, बुद्धि होती तो वे मूर्ख क्यों कहलाते। और जो चीज जिसके पास में नहीं है, उसे वे कैसे दूसरे को दे सकते हैं? अत: अकबर से रहा नहीं गया। 
बादशाह अकबर ने पूछा- 'मूर्खों से?' 
बीरबल- 'हां! मूर्खों से।' जिस आचरण और व्यवहार के कारण आदमी मूर्ख कहलाता है, मैं उनसे बचता रहा। इससे मेरा बुद्धिमान बनने का रास्ता साफ होता गया।' 

(3)चौथ का चांद... 


अकबर-बीरबलनिकले यात्रा पर ईरान, रुके वह वहां के नवाब के बनकर मेहमान। दो दिन रूके वह दोनों, खूब हुई खातिरदारी, फिर आई वापिस लौटने की बारी। नवाब ने बीरबल को जान चतुर सुजान, किया एक टेढ़ा-सा सवाल।
उन्होंने पूछा- 'मेरे एक सवाल का जवाब दोगे? अपने शहंशाह और मेरी तारीफ एक साथ कैसे करोगे?'
बीरबल थोड़ा सोच में पड़ गए, फिर उनकी अकल के ताले खुल गए। बीरबल ने दिया जवाब, 'आप दोनों ही चांद हैं जनाब। मेरे शहंशाह हैं चौथ का चांद तो आप हैं पूरा चांद!'
जवाब सुनकर ईरान के नवाब बेहद खुश हो गए, लेकिन अकबर उस समय कुछ न बोले गुमसुम हो गए। रास्ते भर अकबर रहे बीरबल से बेहद खफा, उन्हें समझ में नहीं आ रहा था उसका फलसफा।
अकबर की नाराजी को बीरबल ताड़ गए, क्यों हैं शहंशाह खफा, कारण भी जान गए।
बोले- 'महाराज आप कुछ सोच रहे हैं, मन ही मन मुझे कोस रहे हैं। पर मैं बताता हूं आपको सच, आपकी तरक्की के बारे में ही सोचता हूं मैं बस। उनको कहा मैंने पूरा चांद, जो धीर-धीरे घटने लगता है श्रीमान। पर आपको बताया चौथ का चांद जो हर रात बढ़ता है और बढ़ता है जिसका मान। आप तो बढ़ते ही जाएंगे और जगह-जगह अपना मकाम बनाएंगे। अब कहिए तो सही, मैंने कौन-सी गलत बात कही?'
बीरबल की बात सुनकर अकबर मुस्कुरा दिए, एक बार फिर बीरबल की अक्ल का लोहा मान गए


(4)उम्र बढ़ाने वाला पेड़ ~ 

परीक्षा के एक बार तुर्किस्तान के बादशाह को अकबर की बुद्धि की लेने का विचार हुआ। उसने एक दूत को पत्र देकर सिपाहियों के साथ दिल्ली भेजा। पत्र का मजमून कुछ इस प्रकार था- 'अकबरशाह! मुझे सुनने में आया है कि आपके भारततवर्ष में कोई ऐसा पेड़ पैदा होता है जिसके पत्ते खाने से मनुष्य की आयु बढ़ जाती है। यदि यह बात सच्ची है तो मेरे लिए उस पेड़ के थोड़े पत्ते अवश्य भिजवाएं.' 
बादशाह उस पत्र को पढ़कर विचारमग्न हो गए। फिर कुछ देर तक बीरबल से राय-मशवरा कर उन्होंने सिपाहियों सहित उस दूत को कैद कर एक सुदृढ़ किले में बंद करवा दिया। इस प्रकार कैद हुए उनको कई दिन बीत गए तो बादशाह अकबर बीरबल को लेकर उन कैदियों को देखने गए। बादशाह को देखकर उनको अपने मुक्त होने की आशा हुई, परन्तु यह बात निर्मूल थी। 

बादशाह उनके पास पहुंचकर बोले - 'तुम्हारा बादशाह जिस वस्तु को चाहता है, वह मैं तब तक उसे नहीं दे सकूंगा जब तक कि इस सुदृढ़ किले की एक-दो ईट न ढह जाए, उसी वक्त तुम लोग आजाद किए जाओगे। खाने-पीने की तुम्हें कोई तकलीफ नहीं होगी। मैंने उसका यथाचित प्रबन्ध करा दिया है।' इतना कहकर बादशाह चले गए, परन्तु कैदियों की चिंता और बढ़ गई। वे अपने मुक्त होने के उपाय सोचने लगे। उनको अपने स्व्देश के सुखों का स्मरण कर बड़ा दुख होता था। वे कुछ देर तक इसी चिंता में डूबे रहे। अंत में वे इश्वर की वन्दना करने लगे- 'हे भगवान! क्या हम इस बन्धन से मुक्त नहीं किए जाएंगे? क्या हमारा जन्म इस किले में बन्द रहकर कष्ट भोगने के लिए हुआ है? आप तो दीनानाथ हैं, अपना नाम याद कर हम असहायों की भी सुध लीजिए।‘ इस प्रकार वे नित्य प्राथर्ना करने लगे। 

अंत में उनकी प्रार्थना का असर हुआ ईश्वर की कृपा हुई। एक दिन बड़े जोरों का भूकम्प आया और किले का कुछ भाग भूकम्प के कारण धराशायी हो गया। सामने का पर्वत भी टूटकर चकनाचूर हो गया। इस घटना के पश्चात दूत ने बादशाह के पास किला टूटने की सूचना भेजी।

बादशाह को अपनी कही हुई बात याद आ गई। इसलिए उन्होंने दूत को उसके साथियों सहित दरबार में बुलाकर बोले - 'आपको अपने बादशाह का आशय बिदित होगा और अब उसका उत्तर भी तुमने समझ लिया है। यदि न समझा हो तो सुनो, मैं उसे और भी स्पष्ट किए देता हूं।' देखो, तुम लोग गणना में केवल सौ हो और तुम्हारी आह से ऐसा सुदृढ़ किला ढह गया, फिर जहां हजारों मनुष्यों पर अत्याचार हो रहा हो, वहां के बादशाह की आयु कैसे बढ़ेगी? उसकी तो आयु घटती ही चली जाएगी और लोगों की आह से उसका शीघ्र ही पतन हो जाएगा। हमारे राज्य में अत्याचार नहीं होता, गरीब प्रजा पर अत्याचार न करना और भलीभांति पोष्ण करना ही आयुवर्धक वृक्ष है। बाकी सारी बातें मिथ्या हैं।‘

इस प्रकार समझा-बुझाकर बादशाह ने उस एलची को उसके साथियों सहित स्वदेश लौट जाने की आज्ञा दी और उनका राह-खर्च भी दिया। उन्होंने तुर्किस्तान में पहुंचकर यहां की सारी बातें अपने बादशाह को समझाईं। अकबर की शिक्षा लेकर बादशाह दरबारियों सहित उनकी भूरि-भुरि प्रशंसा करने लगा।

(5)"आत्मविश्वास" सबसे बड़ा हथियार 


बादशाह अकबर और बीरबल के बीच कभी-कभी ऐसी बातें भी हुआ करती थीं जिनकी परख करने में जान का खतरा रहता था। एक बार बादशाह अकबर ने बीरबल से पूछा- 'बीरबल, संसार में सबसे बड़ा हथियार कौन-सा है?'
'बादशाह सलामत! संसार में सबसे बड़ा हथियार है आत्मविश्वास।' बीरबल ने जवाब दिया।

बादशाह अकबर ने बीरबल की इस बात को सुनकर अपने दिल में रख लिया और किसी समय इसकी परख करने का निश्चय किया। दैवयोग से एक दिन एक हाथी पागल हो गया। ऐसे में हाथी को जंजीरों में जकड़ कर रखा जाता था। बादशाह अकबर ने बीरबल के आत्मविश्वास की परख करने के लिए उधर तो बीरबल को बुलवा भेजा और इधर हाथी के महावत को हुक्म दिया कि जैसे ही बीरबल को आता देखे, वैसे ही हाथी की जंजीर खोल दे।

बीरबल को इस बात का पता नहीं था। जब वे बादशाह अकबर से मिलने उनके दरबार की ओर जा रहे थे, तो पागल हाथी को छोड़ा जा चुका था। बीरबल अपनी ही मस्ती में चले जा रहे थे कि उनकी नजर पागल हाथी पर पड़ी, जो चिंघाड़ता हुआ उनकी तरफ आ रहा था।

बीरबल हाजिर जवाब, बेहद बुद्धिमान, चतुर और आत्मविश्वासी थे। वे समझ गए कि बादशाह अकबर ने आत्मविश्वास और बुद्धि की परीक्षा के लिए ही पागल हाथी को छुड़वाया है।

दौड़ता हुआ हाथी सूंड को उठाए तेजी से बीरबल की ओर चला आ रहा था। बीरबल ऐसे स्थान पर खड़े थे कि वह इधर-उधर भागकर भी नहीं बच सकते थे। ठीक उसी वक्त बीरबल को एक कुत्ता दिखाई दिया। हाथी बहुत निकट आ गया था। इतना करीब कि वह बीरबल को अपनी सूंड में लपेट लेता।

तभी बीरबल ने झटपट कुत्ते की पिछली दोनों टांगें पकड़ीं और पूरी ताकत से घुमाकर हाथी पर फेंका। बुरा तरह घबराकर चीखता हुआ कुत्ता जब हाथी से जाकर टकराया तो उसकी भयानक चीखें सुनकर हाथी भी घबरा गया और पलटकर भागा।

बादशाह अकबर को बीरबल की इस बात की खबर मिल गई और उन्हें यह मानना पड़ा कि बीरबल ने जो कुछ कहा है, वह सच है। आत्मविश्वास ही सबसे बड़ा हथियार है।

(6)बिना काटे ही छोटा करना 

एक दिन अकबर व बीरबल बाग में सैर कर रहे थे। बीरबल लतीफा सुना रहा था और अकबर उसका मजा ले रहे थे। तभी अकबर को नीचे घास पर पड़ा बांस का एक टुकड़ा दिखाई दिया। उन्हें बीरबल की परीक्षा लेने की सूझी। 
बीरबल को बांस का टुकड़ा दिखाते हुए वह बोले, ‘‘क्या तुम इस बांस के टुकड़े को बिना काटे छोटा कर सकते हो ?’’ 
बीरबल लतीफा सुनाता-सुनाता रुक गया और अकबर की आंखों में झांका। 
अकबर कुटिलता से मुस्कराए, बीरबल समझ गया कि बादशाह सलामत उससे मजाक करने के मूड में हैं। 
अब जैसा बेसिर-पैर का सवाल था तो जवाब भी कुछ वैसा ही होना चाहिए था। 
बीरबल ने इधर-उधर देखा, एक माली हाथ में लंबा बांस लेकर जा रहा था। 
उसके पास जाकर बीरबल ने वह बांस अपने दाएं हाथ में ले लिया और बादशाह का दिया छोटा बांस का टुकड़ा बाएं हाथ में। 
बीरबल बोला, ‘‘हुजूर, अब देखें इस टुकड़े को, हो गया न बिना काटे ही छोटा।’’ 
बड़े बांस के सामने वह टुकड़ा छोटा तो दिखना ही था। 
निरुत्तर बादशाह अकबर मुस्करा उठे बीरबल की चतुराई देखकर। 


(7)रेत से चीनी अलग-अलग 

बादशाह अकबर के दरबार की कार्यवाही चल रही थी, तभी एक दरबारी हाथ में शीशे का एक मर्तबान लिए वहां आया। 
‘‘क्या है इस मर्तबान में ?’’ पूछा बादशाह ने। 
वह बोला, ‘‘इसमें रेत और चीनी का मिश्रण है।’’ 
‘‘वह किसलिए ?’’ फिर पूछा अकबर ने। 
‘‘माफी चाहता हूँ हुजूर,’’ दरबारी बोला, ‘‘हम बीरबल की काबलियत को परखना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि वह रेत से चीनी का दाना-दाना अलग कर दे।’’ 
बादशाह अब बीरबल से मुखातिब हुए, ‘‘देख लो बीरबल, रोज ही तुम्हारे सामने एक नई समस्या रख दी जाती है।’’ वह मुस्कराए और आगे बोले, ‘‘तुम्हें बिना पानी में घोले इस रेत में से चीनी को अलग करना है।’’ 

‘‘कोई समस्या नहीं जहांपना,’’ बोला बीरबल, ‘‘यह तो मेरे बाएं हाथ का काम है।’’ कहकर बीरबल ने वह मर्तबान उठाया और चल दिया दरबार से बाहर। बाकी दरबारी भी पीछे थे। बीरबल बाग में पहुंचकर रुका और मर्तबान से भरा सारा मिश्रण आम के एक बड़े पेड़ के चारों ओर बिखेर दिया। 
‘‘यह तुम क्या कर रहे हो ?’’ एक दरबारी ने पूछा। 
बीरबल बोला, ‘‘यह तुम्हें कल पता चलेगा।’’ 
अगले दिन फिर वे सभी उस आम के पेड़ के निकट जा पहुंचे। वहां अब केवल रेत पड़ी थी, चीनी के सारे दाने चीटियां बटोर कर अपने बिलों में पहुंचा चुकी थीं। कुछ चीटियां तो अभी भी चीनी के दाने घसीट कर ले जाती दिखाई दे रही थीं। 
‘‘लेकिन सारी चीनी कहां चली गई ?’’ पूछा एक दरबारी ने। 
‘‘रेत से अलग हो गई।’’ बीरबल ने उसके कान में फुसफुसाते हुए कहा। सभी जोरों से हंस पड़े। 
बादशाह अकबर को जब बीरबल की चतुराई ज्ञात हुई तो बोले, ‘‘अब तुम्हें चीनी ढूंढ़नी है तो चीटियों के बिल में घुसना होगा।’’ 
सभी दरबारियों ने जोरदार ठहाका लगाया और बीरबल का गुणगान करने लगे। 


(8)बादशाह का सपना 

एक रात सोते समय बादशाह अकबर ने यह अजीब सपना देखा कि केवल एक छोड़कर उनके बाकी सभी दांत गिर गए हैं। 
फिर अगले दिन उन्होंने देश भर के विख्यात ज्योतिषियों व नुजूमियों को बुला भेजा और और उन्हें अपने सपने के बारे में बताकर उसका मतलब जानना चाहा। 

सभी ने आपस में विचार-विमर्श किया और एक मत होकर बादशाह से कहा, ‘‘जहांपनाह, इसका अर्थ यह है कि आपके सारे नाते-रिश्तेदार आपसे पहले ही मर जाएंगे।’’ 
यह सुनकर अकबर को बेहद क्रोध हो आया और उन्होंने सभी ज्योतिषियों को दरबार से चले जाने को कहा। उनके जाने के बाद बादशाह ने बीरबल से अपने सपने का मतलब बताने को कहा। 
कुछ देर तक तो बीरबल सोच में डूबा रहा, फिर बोला, ‘‘हुजूर, आपके सपने का मतलब तो बहुत ही शुभ है। इसका अर्थ है कि अपने नाते-रिश्तेदारों के बीच आप ही सबसे अधिक समय तक जीवित रहेंगे।’’ 
बीरबल की बात सुनकर बादशाह बेहद प्रसन्न हुए। बीरबल ने भी वही कहा था जो ज्योतिषियों ने, लेकिन कहने में अंतर था। बादशाह ने बीरबल को ईनाम देकर विदा किया। 

(9)कवि और धनवान आदमी 

एक दिन एक कवि किसी धनी आदमी से मिलने गया और उसे कई सुंदर कविताएं इस उम्मीद के साथ सुनाईं कि शायद वह धनवान खुश होकर कुछ ईनाम जरूर देगा। लेकिन वह धनवान भी महाकंजूस था, बोला, ‘‘तुम्हारी कविताएं सुनकर दिल खुश हो गया। तुम कल फिर आना, मैं तुम्हें खुश कर दूंगा।’’ 

‘कल शायद अच्छा ईनाम मिलेगा।’ ऐसी कल्पना करता हुआ वह कवि घर पहुंचा और सो गया। अगले दिन वह फिर उस धनवान की हवेली में जा पहुंचा। धनवान बोला, ‘‘सुनो कवि महाशय, जैसे तुमने मुझे अपनी कविताएं सुनाकर खुश किया था, उसी तरह मैं भी तुमको बुलाकर खुश हूं। तुमने मुझे कल कुछ भी नहीं दिया, इसलिए मैं भी कुछ नहीं दे रहा, हिसाब बराबर हो गया।’’ 

कवि बेहद निराश हो गया। उसने अपनी आप बीती एक मित्र को कह सुनाई और उस मित्र ने बीरबल को बता दिया। सुनकर बीरबल बोला, ‘‘अब जैसा मैं कहता हूं, वैसा करो। तुम उस धनवान से मित्रता करके उसे खाने पर अपने घर बुलाओ। हां, अपने कवि मित्र को भी बुलाना मत भूलना। मैं तो खैर वहां मैंजूद रहूंगा ही।’’ 

कुछ दिनों बाद बीरबल की योजनानुसार कवि के मित्र के घर दोपहर को भोज का कार्यक्रम तय हो गया। नियत समय पर वह धनवान भी आ पहुंचा। उस समय बीरबल, कवि और कुछ अन्य मित्र बातचीत में मशगूल थे। समय गुजरता जा रहा था लेकिन खाने-पीने का कहीं कोई नामोनिशान न था। वे लोग पहले की तरह बातचीत में व्यस्त थे। धनवान की बेचैनी बढ़ती जा रही थी, जब उससे रहा न गया तो बोल ही पड़ा, ‘‘भोजन का समय तो कब का हो चुका ? क्या हम यहां खाने पर नहीं आए हैं ?’’ 

‘‘खाना, कैसा खाना ?’’ बीरबल ने पूछा। 
धनवान को अब गुस्सा आ गया, ‘‘क्या मतलब है तुम्हारा ? क्या तुमने मुझे यहां खाने पर नहीं बुलाया है ?’’ 
‘‘खाने का कोई निमंत्रण नहीं था। यह तो आपको खुश करने के लिए खाने पर आने को कहा गया था।’’ जवाब बीरबल ने दिया। 
धनवान का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया, क्रोधित स्वर में बोला, ‘‘यह सब क्या है? इस तरह किसी इज्जतदार आदमी को बेइज्जत करना ठीक है क्या ? तुमने मुझसे धोखा किया है।’’ 
अब बीरबल हंसता हुआ बोला, ‘‘यदि मैं कहूं कि इसमें कुछ भी गलत नहीं तो...। तुमने इस कवि से यही कहकर धोखा किया था ना कि कल आना, सो मैंने भी कुछ ऐसा ही किया। तुम जैसे लोगों के साथ ऐसा ही व्यवहार होना चाहिए।’’ 
धनवान को अब अपनी गलती का आभास हुआ और उसने कवि को अच्छा ईनाम देकर वहां से विदा ली। 
वहां मौजूद सभी बीरबल को प्रशंसाभरी नजरों से देखने लगे। 

(10)गलत आदत का अहसास 

अकबर बीरबल के किस्से बहुत ही मशहूर हुआ करते थे यह सुनने में रोचक भी होते थे साथ ही ज्ञान भी देते थे। अकबर बीरबल के किस्से मनोरंजन का ऐसा साधन हैं, जो हँसी ठिठौली तो देते ही हैं साथ ही जीवन का सत्य भी उजागर करते हैं। ऐसा ही एक किस्सा इस कहानी में लिखा गया है। 

एक दिन बादशाह अकबर बहुत परेशान थे, कारण था उनके बेटे की अंगूठा चूसने की आदत। बादशाह अकबर ने कई तरीके आजमाए लेकिन शहजादे की आदत पर कोई असर नहीं हुआ। 

अकबर अपने दरबार में बैठे थे तब उन्हें एक फ़क़ीर के बारे में पता चला जिनकी बातें इतनी अच्छी होती हैं कि टेड़े से टेड़ा व्यक्ति भी सही दिशा में चलने लगता हैं। 

अकबर ने उस फ़क़ीर को दरबार में पेश करने का हुक्म दिया। फ़क़ीर दरबार में आया उसे अकबर ने अपने बेटे की गलत आदत के बारे में बताया और कोई उपाय करने का आग्रह किया। 

दरबार में सभी दरबारी और बीरबल के साथ अकबर और उनका बेटा भी था। फ़क़ीर ने थोड़ी देर सोचा और कहा कि मैं एक हफ़्ते बाद आऊंगा और वहां से चला गया। अकबर और सभी दरबारियों को यह बात अजीब लगी कि फ़क़ीर बिना शहजादे से मिले ही चले गए। 

एक हफ़्ते के बाद, फ़क़ीर दरबार में आये और शहज़ादे से मिले और उन्होंने शहज़ादे को प्यार से मुहं में अंगूठा लेने से होने वाली तकलीफ़ों के बारे में समझाया और शहज़ादे ने भी कभी भी अंगूठा ना चूसने का वादा किया। 

अकबर ने फ़क़ीर से कहा कि यह काम तो आप पिछले हफ़्ते ही कर सकते थे। सभी दरबारियों ने भी नाराज़गी व्यक्त की, कि इस फ़क़ीर ने हम सभी का वक्त बरबाद किया, और इसे सजा मिलनी चाहिए क्यूंकि इसने दरबार की तौहीन की है। 

अकबर को भी यही सही लगा और उसने सजा सुनाने का तय किया। सभी दरबारियों ने अपना अपना सुझाव दिया। अकबर ने बीरबल से कहा – बीरबल तुम चुप क्यूँ हो ? तुम भी बताओं की क्या सजा देनी चाहिए ? 

बीरबल ने जवाब दिया जहांपनाह! हम सभी को इस फ़क़ीर से सीख लेनी चाहिए और इन्हें एक गुरु का दर्जा देकर आशीर्वाद लेना चाहिए। 
अकबर ने गुस्से में कहा बीरबल ! तुम हमारी और सभी दरबारियों की तौहिन कर रहें हो। 

बीरबल ने कहा जहांपनाह ! गुस्ताखी माफ़ हो। लेकिन यही उचित न्याय हैं। जिस दिन फ़क़ीर पहली बार दरबार में आये थे और आप जब शहजादे के बारे में उनसे कह रहे थे तब आप सभी ने फ़क़ीर को बार बार कुछ खाते देखा होगा। दरअसल फ़क़ीर को चूना खाने की गलत आदत थी। 
जब आपने शहज़ादे के बारे में कहा तब उन्हें उनकी गलत आदत का अहसास हुआ और उन्होंने पहले खुद की गलत आदत को सुधारा। इस बार जब फ़क़ीर आये तब उन्होंने एक बार भी चूने की डिबिया को हाथ नहीं लगाया। 
यह सुनकर सभी दरबारियों को अपनी गलती समझ आई और सभी से फ़क़ीर का आदर पूर्वक सम्मान किया।

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